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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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अपने हिस्से की हमें भी अब इमरती चाहिए !

Posted On 24 Apr, 2016 में

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कोख में ही क़त्ल होने से बची कलियाँ हैं हम ,
खिल गयी हैं इस जगत में झेलकर ज़ुल्मो सितम ,
मांगती अधिकार स्त्री भीख नहीं चाहिए ,
अपने हिस्से की हमें भी अब इमरती चाहिए !
……………………………………………………..
पितृसत्ता ने इशारों पर नचाई स्त्री ,
देह की ही कोठरी में बंद कर दी स्त्री ,
पितृसत्ता की नौटंकी बंद होनी चाहिए ,
अपने हिस्से की हमें भी अब इमरती चाहिए !
…………………………………………….
है पुरुष को ये अहम नीच स्त्री उच्च हम ,
साथ साथ फिर भला कैसे बढ़ा सकती कदम ,
‘आइटम’ कहते हुए लज्जा तो आनी चाहिए !
अपने हिस्से की हमें भी अब इमरती चाहिए !
………………………………………………………….
चौखटों को पार कर आई है जो भी स्त्री ,
पितृ सत्ता को नहीं भायी है ऐसी स्त्री ,
चीरहरण की भुजायें अब तो कटनी चाहिए !
अपने हिस्से की हमें भी अब इमरती चाहिए !
……………………………………………………….
तुम जलाकर देख लो सीता नहीं जलती कोई ,
न अहल्या न शकुंतला छल से ही डरती कोई ,
स्त्री को चैन की अब श्वांस मिलनी चाहिए !
अपने हिस्से की हमें भी अब इमरती चाहिए !

शिखा कौशिक ‘नूतन’



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
April 27, 2016

प्रिय शिखा बहुत समय बाद आपको ब्लॉग पर देखा और आपकी लिखी दिल को छू जाने वाली और आंसू लाने वाली पंक्तियां पढ़ी तुम जलाकर देख लो सीता नहीं जलती कोई , न अहल्या न शकुंतला छल से ही डरती कोई , स्त्री को चैन की अब श्वांस मिलनी चाहिए ! अपने हिस्से की हमें भी अब इमरती चाहिए !अपने हिस्से की इमरती चाहिए भारतीयता से जुडी लाएं अति सुंदर


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