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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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''हैं बहुत गहरे मेरे,ज़ख्म न भर पायेंगें !''

Posted On: 8 Dec, 2015 Others में

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मरहम तसल्ली के लगा लो ,राहत नहीं कर पायेंगें ,
हैं बहुत गहरे मेरे , ज़ख्म न भर पायेंगें !
………………………………………………………
टूटा है टुकड़े-टुकड़े दिल ,कैसे ये जुड़ जायेगा ,
जोड़ पाने की जुगत में और चोट खायेगा ,
दर्द के धागों से कसकर लब मेरे सिल जायेंगें !
हैं बहुत गहरे मेरे , ज़ख्म न भर पायेंगें !
…………………………………………………
है मुकद्दर की खता जो मुझको इतने ग़म मिले ,
रुक नहीं पाये कभी आंसुओं के सिलसिले ,
है नहीं उम्मीद बाकी अच्छे दिन भी आयेंगें !
हैं बहुत गहरे मेरे , ज़ख्म न भर पायेंगें !
………………………………………………..
अब तड़पकर रूह मेरी कहती है अक्सर बस यही ,
और क्या-क्या देखने को तू यहाँ ज़िंदा रही ,
मौत के आगोश में ”नूतन” सुकूं ले पायेंगें !
हैं बहुत गहरे मेरे , ज़ख्म न भर पायेंगें !

शिखा कौशिक ”नूतन’



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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
December 8, 2015

प्रिय शिखा जी कभी आशा वादी कविता भी लिखें मैं तो तरस गई आपके द्वारा सुख स्वप्न पर लिखी कविताओं के लिए कभी मेरे लिए ही लिख दें ‘अब तड़पकर रूह मेरी कहती है अक्सर बस यही , और क्या-क्या देखने को तू यहाँ ज़िंदा रही , मौत के आगोश में ”नूतन” सुकूं ले पायेंगें ! हैं बहुत गहरे मेरे , ज़ख्म न भर पायेंगें !दुखी कर गई यह पंक्तियाँ


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