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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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'लिखते अगर तुलसी सिया का वनवास '

Posted On: 24 Jun, 2015 Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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Stamp on Tulsidas


सात कांड में रची तुलसी ने ‘ मानस ‘  ;

आठवाँ लिखने का क्यों कर न सके साहस ?


आठवे में लिखा  जाता  सिया  का विद्रोह  ;

पर त्यागते  कैसे  श्री राम यश का मोह ?


लिखते अगर तुलसी सिया का वनवास ;

घटती राम-महिमा उनको था विश्वास .


अग्नि परीक्षा और शुचिता प्रमाणन  ;

पूर्ण कहाँ इनके बिना होती है रामायण ?


आदिकवि  सम  देते  जानकी  का  साथ ;

अन्याय को अन्याय कहना है नहीं अपराध .


लिखा कहीं जगजननी कहीं  अधम नारी ;

मानस के रचनाकार में भी पुरुष अहम् भारी .


तुमको दिखाया पथ वो  भी  थी एक नारी ;

फिर कैसे लिखा तुमने ये ताड़न की अधिकारी !


एक बार तो वैदेही की पीड़ा को देते स्वर ;

विस्मित हूँ क्यों सिल गए तुलसी तेरे अधर !


युगदृष्टा -लोकनायक गर ऐसे रहे मौन ;

शोषित का साथ देने को हो अग्रसर कौन ?


भूतल में क्यूँ समाई  सिया करते स्वयं मंथन ;

रच काण्ड आँठवा करते सिया का वंदन .


चूक गए त्रुटि शोधन  होगा नहीं कदापि ;

जो सत्य न लिख पाए वो लेखनी हैं पापी .



हम लिखेंगे सिया  के विद्रोह  की  कहानी ;

लेखन में नहीं चल सकेगी पुरुष की मनमानी !!


शिखा कौशिक ‘नूतन’




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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
July 3, 2015

युगदृष्टा-लोकनायक गर ऐसे रहें मौन, शोषित का साथ देने को हो अग्रसर कौन ? ठीक ही तो है । पर एक अनदेखा और अनकहा सच तो यह भी है शिखा जी कि कथित लोकनायक भी अपने-अपने पूर्वाग्रहों की बेड़ियों में ही जकड़े रहते हैं । अन्याय का विरोध करने के लिए खुला मनोमस्तिष्क होना पहली आवश्यकता है जो कि अक्सर घोषित नायकों (और क्षमा कीजिए, नायिकाओं भी) में देखने में नहीं आती । अन्याय के विरोध और न्याय की पुकार के लिए पहले न्याय-अन्याय की सही पहचान तो होनी चाहिए । लोकप्रियता की अनुगूंज में हमारे नायक अक्सर ऐसी पहचान करने की कोई आवश्यकता ही अनुभव नहीं करते । यह बात बीते युग में जितनी सत्य थी, उतनी ही सत्य आज भी है । आपकी कविता आपके साहस का जीता-जागता प्रमाण है । साधुवाद ।

Jitendra Mathur के द्वारा
July 3, 2015

अत्यंत साहसिक और सत्यनिष्ठा से ओतप्रोत स्वर हैं इस कविता में । साधुवाद शिखा जी ।

ashasahay के द्वारा
June 30, 2015

बहुत सुन्दर।बार बार प्रतिक्रिया भेजना चाह रही हुूँ कि आपने वह साहस दिखाया जो कविवर मै थिली शरण गुप्त भी नदिखा सके  सत्संकल्प के लिए बधाई। —-आशा सहाय


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