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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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''शायद यही प्यार है !''-लघु कथा

Posted On: 6 Apr, 2015 Others में

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रमन आज अपने जीवन के साठ वें दशक में प्रवेश कर रहा था . उसकी जीवन संगिनी विभा को स्वर्गवासी हुए पांच वर्ष हो चुके थे .रमन आज तक नहीं समझ पाया कि एक नारी की प्राथमिकताएं जीवन के हर नए मोड़ पर कैसे बदलती जाती हैं . जब उसका और विभा का प्रेम-प्रसंग शुरू हुआ था तब विभा से मिलने जब भी वो जाता विभा उससे पूछती -” आज मेरे लिए क्या खास लाये हो ?” और रमन मुस्कुराकर एक खूबसूरत सा फूल उसके जूड़े में सजा देता .विवाह के पश्चात विभा ने कभी नहीं पूछा कि रमन उसके लिए क्या लाया है बल्कि घर से चलने से पहले और घर पहुँचने पर बस उसके लबों पर होता -” पिता जी की दवाई ले आना , माता जी का चश्मा टूट गया है ..ठीक करा लाना , और भी बहुत कुछ ..मानों रमन के माता-पिता उससे बढ़कर अब विभा के हो चुके थे . बच्चे हुए तो बस उनकी फरमाइश पूरी करवाना ही विभा का काम रह गया -”बिट्टू को साईकिल दिलवा दीजिये ….मिनी को उसकी पसंद की गुड़िया दिलवा लाइए …” रमन ने मन में सोचा -” मैं चकित रह जाता आखिर एक प्रेमिका से पत्नी बनते ही कैसे विभा बदल गयी .अपने लिए कुछ नहीं और परिवार की छोटी-से छोटी जरूरत का ध्यान रखना . शायद इसे ही प्यार कहते हैं जिसमे अपना सब कुछ भुलाकर प्रियजन से जुड़े हर किसी को प्राथमिकता दी जाती है .” रमन ने लम्बी साँस ली और विभा की यादों में खो गया क्योंकि यही उसके जीवन के साठ वे दशक में प्रवेश का सबसे प्यारा उपहार था .

शिखा कौशिक ‘नूतन’

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
April 7, 2015

प्रिय शिखा जी बहुत सुंदर प्रेम कथा और पत्नी का पति के प्रति लगाव जिसे पैसे या गिफ्ट से नहीं तोला जा सकता डॉ शोभा

April 6, 2015

शायद नहीं यही सच्चा प्यार है जिसमे अपने प्रिय के हर करीबी को अपना बना लिया जाये .बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .बधाई .


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