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''औरत के ज़िस्म पर ही टिक जाती हैं निगाहें''

Posted On: 7 Jan, 2015 कविता,Celebrity Writer में

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औरत के ज़िस्म पर ही ;
टिक जाती हैं निगाहें ,
कितना ढके वो खुद को ;
ये मर्द ही बताये !!
……………………………..
रख खुद को ढक-छिपाकर ,
क्या बावरी हुई है !
जिसने उघाड़ा खुद को ;
बदनाम वो हुई है ,
जिसकी लुटी है अस्मत;
इल्ज़ाम वो ही पाये !
कितना ढके वो खुद को ;
ये मर्द ही बताये !!
……………………………………..
है ‘नेक ‘ वही औरत ;
पर्दे में जो है रहती ,
बेपर्दगी को दुनिया ;
बेहयाई कहती ,
हर माँ से उसकी बेटी ,
ये ही सुने-सुनाये !
कितना ढके वो खुद को ;
ये मर्द ही बताये !!
………………………………..
इस जिस्म के अलावा ;
तेरा वज़ूद क्या है ?
बस इसकी कर हिफाज़त ;
मर्द की सलाह है ,
दिन-रात डरे औरत ;
नापाक न हो जाये !
कितना ढके वो खुद को ;
ये मर्द ही बताये !!
………………………….
सदियों से रखा खुद को ;
औरत ने है छिपाकर ,
मक्कार मर्द खुश है ;
कठपुतलियां बनाकर ,
ऊँगली के इशारों पर
औरत को है नचाये !
कितना ढके वो खुद को ;
ये मर्द ही बताये !!

शिखा कौशिक ‘नूतन’



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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ravindersingh के द्वारा
January 11, 2015

बहुत सुन्दर और अच्छी कविता,प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार !

sadguruji के द्वारा
January 11, 2015

सदियों से रखा खुद को ; औरत ने है छिपाकर , मक्कार मर्द खुश है ; कठपुतलियां बनाकर , ऊँगली के इशारों पर औरत को है नचाये ! कितना ढके वो खुद को ; ये मर्द ही बताये !! आदरणीया शिखा कौशिक ‘नूतन’ जी ! बहुत सुन्दर और प्रभावी रचना ! मंच पर इतनी अच्छी प्रस्तुति के लिए हार्दिक आभार !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
January 10, 2015

शालिनी जी उत्तम कटीली निगाहों की   चुभन ,किंतु यही  गुदगुदाती है जब प्रियतम की होती है ओम शांति शांति का नूतन अहसास करते स्वसन तीब्रता से निगाहें बन्द कर देती है 

Shobha के द्वारा
January 10, 2015

प्रिय शिखा जी बहुत सुंदर कविता मुझे आखिरी पैरा बहुत ही अच्छा लगा आप नये वर्ष में खुश रहें ऐसी अच्छी कविताएँ लिखती रहें डॉ शोभा

yamunapathak के द्वारा
January 9, 2015

शिखा जी पंक्तियाँ बहुत सही हैं और यह ज़रूरी है की स्त्री की मेधा बुद्धि दक्षता का महत्व होना चाहिए

chaatak के द्वारा
January 8, 2015

अच्छी कविता, अच्छे भाव, दुनिया सिर्फ बाजार है स्त्री भी कब तक अपने आपको सिर्फ देह न मान ले; उसे पता है इस बाजार में सिर्फ इसके ही चाहने वाले है|

Bhola nath Pal के द्वारा
January 7, 2015

डॉ शिखा जी ! उचित आपत्ति i सबमें अपनी बहन देख कर civil eye रखनी चाहिए i अच्छी कविता …………..


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