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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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अपमानों के अंधड़ झेले ; छल तूफानों से टकराए ,

Posted On: 20 Sep, 2014 कविता,Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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अपमानों के अंधड़ झेले ;
छल तूफानों से टकराए ,
कंटक पथ पर चले नग्न पग
तब हासिल हम कुछ कर पाए !

………………………………………..


आरोपों  की कड़ी धूप में
खड़े रहे हम नंगे सिर ,
लगी झुलसने आस त्वचा थी
किंचित न पर हम घबराये !

………………………………………….


व्यंग्य-छुरी दिल को चुभती थी ;
चुप रहकर सह जाते थे ,
रो लेते थे सबसे छिपकर ;
सच्ची बात तुम्हे बतलाएं !

………………………….


कई चेहरों से हटे मखौटे ;
मुश्किल वक्त में साथ जो छोड़ा ,
नए मिले कई हमें हितैषी
जो जीवन में खुशियाँ लाये !

…………………………….

धीरज बिन नहीं कुछ भी संभव ;
यही सबक हमने है सीखा ;
जिन वृक्षों ने पतझड़ झेला
नव कोंपल उन पर ही आये !



शिखा कौशिक ‘नूतन’


[ मेरी शोध यात्रा के पड़ावों को इस भावाभिव्यक्ति के माध्यम से उकेरने का एक सच्चा प्रयास मात्र है ये ]




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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Udai Shankar Srivastava के द्वारा
September 24, 2014

शब्दों का चयन , भाव , सबकुछ अतिसुन्दर I

jlsingh के द्वारा
September 24, 2014

धीरज बिन नहीं कुछ भी संभव ; यही सबक हमने है सीखा ; जिन वृक्षों ने पतझड़ झेला नव कोंपल उन पर ही आये सुन्दर व सहज अभिव्यक्ति! बधाई!

sanjay kumar garg के द्वारा
September 23, 2014

“अपमानों के अंधड़ झेले ; छल तूफानों से टकराए , कंटक पथ पर चले नग्न पग तब हासिल हम कुछ कर पाए” सुन्दर अभिव्यक्ति! आदरणीय शिखा जी! बधाई!

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
September 23, 2014

शिखा जी, जीवन के संघर्षों को अभिवयक्त करती आपकी यह कविता हर एक को अपनी ही कहानी लगेगी , थोडे बहुत अंतर के साथ, शायद यही जिंदगी का सच है कि सबकुछ अच्छा नहीं होता । 

September 23, 2014

मन के भावों को सुन्दर शब्दों से अभिव्यक्त किया है आपने .badhai

Shobha के द्वारा
September 22, 2014

प्रिय डॉ शिखा काफी समय बाद आपकी रचना पढने को मिली बहुत ही खूबसूरत भावों वाली कविता आप सदैव बढ़िया लिखती हैं डॉ शोभा

Jaynit Kumar Mehta के द्वारा
September 22, 2014

Bahut achchhi kavita hai,Shikha ji.. Mujhe kaafi pasand aayi!! Badhaai…! :)

Ravinder kumar के द्वारा
September 22, 2014

शिखा जी, सादर नमन. धीरज बिन नहीं कुछ भी संभव ; यही सबक हमने है सीखा ; जिन वृक्षों ने पतझड़ झेला नव कोंपल उन पर ही आये ! शिखा जी, कहा जाता है के कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है. इस खोने पाने में जो धीरज नहीं खोता, वह खो कर भी रिक्त नहीं होता. वह निकल पड़ता है लक्ष्य पाने के लिए. बेहतरीन अभिव्यक्ति.

bhagwandassmendiratta के द्वारा
September 22, 2014

सुन्दर शब्द व सुन्दर भाषा से गुंथी हुई माला है आपकी ये नूतन कविता | जीवन के थपेड़ों पर आशा की मलहम लगाती हुई प्रस्तुति| बहुत बहुत धन्यवाद|

sadguruji के द्वारा
September 21, 2014

कई चेहरों से हटे मखौटे ; मुश्किल वक्त में साथ जो छोड़ा , नए मिले कई हमें हितैषी जो जीवन में खुशियाँ लाये ! ……………………………. धीरज बिन नहीं कुछ भी संभव ; यही सबक हमने है सीखा ; जिन वृक्षों ने पतझड़ झेला नव कोंपल उन पर ही आये ! आदरणीया डॉ शिखा कौशिक ‘नूतन’ जी ! बहुत अनुभवगम्य और शिक्षाप्रद रचना ! मन को छू गई ! बहुत अच्छी लगी ! हम सबसे शेयर करने के लिए बहुत बहुत आभार !


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