! अब लिखो बिना डरे !

शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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''मर्दों ने कब्ज़ा ली कोख ''

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आँखें नम
लब खामोश
घुटती सांसें
दिल में क्षोभ
उठा रही
सदियों से औरत
मर्दों की दुनिया
के बोझ !
………………………………..
गाली ,घूसे ,
लात , तमाचे
सहती औरत
युग-युग से
फंदों पर कहीं
लटकी मिलती ,
दी जाती कहीं
आग में झोंक !
…………………………
वहशी बनकर
मर्द लूटता
अस्मत
इस बेचारी की ,
दुनिया केवल
है मर्दों की
कहकर
कब्ज़ा ली
है कोख !

शिखा कौशिक ‘नूतन’



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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Neha Verma के द्वारा
June 11, 2014

शिखा जी बहुत ही ख़ूबसूरत तरीके से बयां की आपने महिलाओ की इस समाज में दुर्दशा…बधाई… :)

Sushma Gupta के द्वारा
June 10, 2014

एक नारी की आत्म-व्यथा का अति मार्मिक चित्रण है आपकी इस रचना में, शिखा जी वधाई ..

पीड़ा भी है आक्रोश भी है पर समझेंगे क्या वो पत्थरदिल इन भावनाओ को…सार्थक..प्रस्तुति आभार..

KKumar Abhishek के द्वारा
June 9, 2014

कविता के भाव भारतीय समाज की एक दर्दनाक तस्वीर की झलक हैं, !आपकी रचना पढ़ के दर्द ह्रदय के अंतःकरण में प्रवेश कर गया क्योकि , “मैं भी एक मर्द हूँ” ! एक बहन जब ऐसी रचनाएँ लिखती है, तो ह्रदय से यही आवाज निकलती है…”क्या हम वास्तव में इन्शान हैं?” ……..शानदार प्रयास के लिए बधाई !

jlsingh के द्वारा
June 8, 2014

आदरणीया शिखा जी, आपका आक्रोश सही है ! इस बुराई को ख़त्म करने का बीरा कौन उठाएगा …कोई …’राजा राम मोहन राय’?

    DR. SHIKHA KAUSHIK के द्वारा
    June 9, 2014

    राजा राममोहन रे भी केवल बाल-विवाह पर रोक लगवाने में सफल हुए थे .हिन्दू समाज के समक्ष विधवा-विवाह की तार्किकता में वे पूर्ण सफल नहीं हो पाये थे .जब तक हर parivar balak-balika में antar karna बंद नहीं करता तब तक कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकल सकता .

June 8, 2014

गाली ,घूसे , लात , तमाचे सहती औरत युग-युग से फंदों पर कहीं लटकी मिलती , दी जाती कहीं आग में झोंक ! sach ko bebaki se likha hai aapne .well written .thanks

June 8, 2014

गाली ,घूसे , लात , तमाचे सहती औरत युग-युग से फंदों पर कहीं लटकी मिलती , दी जाती कहीं आग में झोंक ! sach ko bebaki se likha hai aapne .well written .


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