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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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बलात्कार पर शोर मचाने की क्या जरूरत है !!!

Posted On: 31 May, 2014 Others,Politics,Celebrity Writer में

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रोज़ दस बलात्कार होते हैं हमारे उत्तर प्रदेश में …इसलिए अगर बदायूं में दो दलित किशोरियों का बलात्कार करके उन्हें फांसी पर लटका दिया गया तो इसमें इतना शोर मचाने की क्या जरूरत है !कुछ ऐसा रवैय्या है हमारे प्रदेश की सरकार का .ऐसे में किसी भी तबके की महिलाएं हमारे प्रदेश में कितनी सुरक्षित हैं इसे बिना किसी जांच-पड़ताल के समझा जा सकता है .सवाल केवल सरकार का भी नहीं है ..सवाल है हमारे सामाजिक ढांचें का जिसमे उच्च जाति का मर्द दलित औरत की अस्मत लूटना कोई अपराध नहीं समझता .जब इतने बड़े अपराध को ये कहकर हवा में उड़ा दिया जाता है कि – ”लड़के हैं गलती हो जाती है ” तब इस वीभत्स अपराध को अंजाम देने वालों का हौसला कितना बढ़ जाता है इसका परिणाम है ऐसी घटनाएँ .सोच किस-किस की पलटी जाये ..सुधारी जाये ? यही बड़ा मुद्दा है .महिला होने की कीमत कब तक चुकानी होगी उसकी देह को ये कोई महिला नहीं जानती .महिला होना और दलित होना तो मानों पाप की श्रेणी में ही आता है .अब और क्या लिखें -

लुट रही अस्मत किसी की जनता तमाश बीन है ;
इंसानियत की निगाह में जुल्म ये संगीन है .
………………………………………………………….

चैनलों को मिल गयी एक नयी ब्रेकिंग न्यूज़ ;
स्टूडियों में जश्न है मौका बड़ा रंगीन है .
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अखबार में छपी खबर पढ़ रहे सब चाव से ;
पाठक भी अब ऐसी खबर पढने के शौक़ीन हैं .
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ये हवस की इंतिहा’ है इससे ज्यादा क्या कहें ?
कर न लें औरत को नंगा ये मर्द की तौहीन है .
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बीहड़ बनी ग़र हर जगह कब तक सहेगी जुल्म ये ;
कई और फूलन आएँगी पक्का मुझे यकीन है .

शिखा कौशिक ‘नूतन’



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
June 1, 2014

बीहड़ बनी ग़र हर जगह कब तक सहेगी जुल्म ये ; कई और फूलन आएँगी पक्का मुझे यकीन है . मैं भी आपके इस विचार का समर्थन करता हूँ…

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
June 1, 2014

बीहड़ बनी ग़र हर जगह कब तक सहेगी जुल्म ये ; कई और फूलन आएँगी पक्का मुझे यकीन है . लगता है अब इसी की फिर जरुरत भी है इन हैवानों के लिए …बड़ा दुखद है कड़ी से कड़ी सजा और यही परिणाम हो भ्रमर ५

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
June 1, 2014

आपकी पीड़ा और चिंता हर संवेदनशील व्यक्ति की है । दरअसल इन घटनाओं के कारणों की जड़ों तक पहुचने की कोशिश में अभी तक सतही प्रयास ही हुये हैं । मीडिया के शोर, कुछ लोगों के गाल बजाऊ भाषण, दिखावटी कानून और मोमबत्तियों तक सीमित होकर रह गई हैं चिंतायें । इसे कई पहलूओं से समझने की जरूरत है ।

May 31, 2014

सहमत हूँ आपसे .सही लिखा है आपने .सार्थक प्रस्तुति .आभार

rajanidurgesh के द्वारा
May 31, 2014

आपकी बातों से दर्द साफ झलकता है ,वास्तव में यह हृदयविदारक ghatana आम बात ही हो गयी है .

Shobha के द्वारा
May 31, 2014

आपने बड़े दर्द से बहूत बड़े विषय को लिया है कई और फूलन आएँगी पक्का मुझे यकीन शोभा


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