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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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पर्दे में घुटती औरत !

Posted On: 15 May, 2014 Junction Forum,Celebrity Writer में

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पर्दे में रहते हुए
वो घुट रही है ,
मर रहे हैं उसके
चिंतनशील अंतर्मन
के विचार,
और सिमट रहे हैं
अभिलाषाओं के फूल ,
जो कभी खिले थे
ह्रदय के उपवन में ,
कि दे पाऊँगी
इस विश्व को नूतन कुछ
और हो जाउंगी
मरकर भी अमर !!

शिखा कौशिक ‘नूतन’



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajanidurgesh के द्वारा
May 18, 2014

बहुत ही मर्मस्पर्शी कविता बधाई

mithilesh dhar dubey के द्वारा
May 18, 2014

क्या बात है। सुन्दर रचना।


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