! अब लिखो बिना डरे !

शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

570 Posts

1437 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 12171 postid : 687542

कविता-चौदह बरस विरह-ताप को कैसे सहेगी उर्मिला ?[contest ]

Posted On: 15 Jan, 2014 Contest,Celebrity Writer में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

देख कर उर्मिल का मुख ,
माँ का ह्रदय व्यथित हुआ ,
दैव ने नव-वधु को
क्यूँ ये दारुण दुःख दिया ?
…………………………………
भर आये अश्रु नयनों में ,
जननी लखन की हुई विकल ,
मन में उठे ये भाव थे ,
होनी ही होती है प्रबल !
………………………………..
लाये थे भ्रात चारो जब ,
ब्याह कर वधू साकेत में ,
आनंद छा गया था तब ,
दशरथ के इस निकेत में !
……………………………………
वो दिवस और आज का ,
दोनों में कितना भेद है !
कैकेयी जीजी को भी अपनी
करनी पर अब खेद है !
……………………………..
ये सोचती सुमित्रा ने
उर्मिल से बस इतना कहा ,
आ निकट पुत्री ! मेरी
न मन ही मन अश्रु बहा !
……………………………
उर्मिल ने देखा मात को
आई वहाँ उनके निकट ,
माता की पीड़ा देखकर
उर गया उर्मिल का फट !
…………………………………..
बोली दबाकर पीड़ा निज
माँ ! आज आप मौन हैं !
बस देखती एकटक मुझे
और सब कुछ गौण है !
………………………………
माता ने देखा नेह से
उर्मिल निकट ही थी खड़ी ,
नन्ही सी उनकी उर्मिला
करने लगी बातें बड़ी !
………………………………
उर के समीप लाइ तब
ममता छलकने थी लगी ,
मुरझाये न दुःख -ताप से
मेरी सुकोमल सी कली !
……………………………..
चौदह बरस विरह-ताप को
कैसे सहेगी उर्मिला ?
जब मैं स्वयं अधीर हूँ
कैसे दूं इसको सांत्वना ?
……………………………………..
देख माता को विकल
उर्मिल ने बस इतना कहा ,
हे मात! रखिए धैर्य
टल जायेगा संकट महा !
…………………………
मैं हूँ जनक की नंदनी
सीता की छोटी हूँ बहन ,
हमको सिखाया मात ने
कैसे निभाते पत्नी-धर्म ?
…………………………….
विचलित नहीं व्यथित नहीं ,
मुझको अटल विश्वास है ,
आयेंगें लौट सब कुशल ,
चौदह बरस की बात है !
……………………………………………
आप चिंतित न हो माँ !
है ये परीक्षा की घडी ,
धर्म -पथ पर बढे प्रिय
उर्मिल भी उस पर बढ़ चली !
……………………….
अब शोक मात !त्यागिये ,
उर्मिल निवेदन कर रही ,
हैं आप ही सम्बल मेरा
हे मात ! आप महिमामयी !
………………………………….
उर्मिल वचन फुहार से
माँ का ह्रदय शीतल भया ,
मनोकामना बस हो कुशल से
लखन संग रघुबर-सिया !

शिखा कौशिक ‘नूतन’



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

6 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 21, 2014

सुन्दर पद्यात्मक पौराणिक आख्यान ! शिखा जी बधाई ! प्रवाह को और साधें !

yatindrapandey के द्वारा
January 21, 2014

हैलो शिखा जी माफ़ कीजियेगा पिछले एक प्रतिक्रिया में मैंने आपका नाम गलत लिख दिया था. आपकी रचना बेहद सुन्दर और दिल को छू लेने वाली है आभार स्वीकार करे यतीन्द्र

sadguruji के द्वारा
January 21, 2014

आप चिंतित न हो माँ ! है ये परीक्षा की घडी , धर्म -पथ पर बढे प्रिय उर्मिल भी उस पर बढ़ चली !बहुत अच्छी कविता बधाई.

yamunapathak के द्वारा
January 20, 2014

शिखा जी उर्मिला का दुःख माँ के नवीन प्रसंग की कल्पना से बहुत खूबसूरत बन गई HAI.

vaidya surenderpal के द्वारा
January 20, 2014

बहुत सुन्दर काव्य रचना।

January 15, 2014

बहुत सुन्दर भावात्मक अभिव्यक्ति .


topic of the week



latest from jagran