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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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संस्मरण -अलविदा जॉन्टी [contest ]

Posted On: 13 Jan, 2014 Others में

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सन २००६-०७ की नवम्बर की एक शाम .श्वान को रोटी डालने के लिए घर के बाहर अपने चबूतरे पर खड़ी थी .तभी एक भूरे बालों वाला प्यारा सा श्वान दिखाई दिया .मैंने तुरंत रोटी के टुकड़े कर उसके सामने डाल दिए पर तभी मुझे लगा कि ये किसी का पालतू श्वान तो नहीं ?क्योंकि उस प्यारे से श्वान के गले में घुंघरू वाला पट्टा पड़ा हुआ था .उसने रोटी खाई और कहीं चला गया . इसके कुछ दिन बाद घर में छत पर से घुंघरू की आवाज़ें सुनकर हम उधर देखने के लिए बढे ही थे कि वही प्यारा भूरे बालों वाला श्वान बाहर की सीढियाँ उतरकर उछल-कूद मचाता हुआ भाग गया .कभी पड़ोस के किसी घर की चौखट पर बैठा दिखता तो कभी बाजार में किसी दुकान की छत पर घूमता हुआ . जहाँ भी दिखता पुचकारते ही दौड़ता हुआ हमारे पास ही चला आता हालाँकि श्वान को इतने नजदीक देखकर हम अंदर से डर जाते थे .क्योंकि सन २००५ के अक्टूबर में हमारे पालतू श्वान जिसका नाम ”जुलु” था ने बहुत बुरी तरह मेरे काटा था और फिर एक सप्ताह बाद दीदी के . इसी वजह से बहुत तरकीब से उसे एक बोरे में बंद कर के घर से दूर भिजवाना पड़ा था .इस काम में ”फाना” नाम के हमारे परिचित ने हमारा बहुत सहयोग किया था .इन्हीं ‘फाना ‘ ने जब हमें ये सूचना दी थी कि ‘जुलु’ को जहाँ छोड़ा गया है वो वहाँ से भाग गया है तब कई रात तक हमारी नींद उडी रही थी कि कहीं ‘जुलु’ यहाँ वापस न आ जाये .खैर वो लौट कर नहीं आया पर श्वान की इमेज हमारे दिल व् दिमाग में ख़राब कर गया .इस भूरे बालों वाले श्वान ने अपने प्यारेपन व् शांत स्वाभाव से श्वान की छवि फिर से अच्छी कर दी .कभी कभी वो पास में आकर खड़ा हो जाता तो दिल करता इसका सिर सहला दूं और एक दिन सहला भी दिया .इस तरह उसकी व् हमारी मित्रता बढ़ती गयी .एक दिन हमने नोटिस क्या कि हम जहाँ भी जाते हैं चाहे वो पोस्ट ऑफिस हो अथवा मेडिकल स्टोर वो प्यारा सा श्वान हमारा बॉडी गार्ड बन कर हमारे साथ साथ जाता है और जब तक हम कहीं से अपना काम न निपटा लें वो वही रहता .
एक दिन ऐसा भी आया कि उसने हमारे घर की बाहरी दहलीज़ में कब्ज़ा किये बंदरों के समूह से टक्कर ले ली .बंदरों के सरदार जिसका नाम हमने ”नीलू’ रखा हुआ था उस प्यारे से श्वान को अपने समूह के साथ चक्रव्यूह रचकर घेर लिया .हमने बहुत डंडा फटकाया .. पर बंदरों ने प्यारे से श्वान को चोट पहुंचा ही दी .किसी तरह जब बंदरों ने वहाँ से प्रस्थान क्या तब हम दहलीज़ तक पहुंचे तब वह प्यारा सा श्वान अपने को चाट-चाट कर ठीक कर रहा था .हमने उसे हल्दी वाला दूध पीने के लिए बुलाया तो पहले तो वो घर के अंदर आने से हिचका पर फिर अंदर आकर दूध पिया और चला गया .उस दिन से उस प्यारे से श्वान से दोस्ती और भी पक्की हो गयी .
अब उसका नामकरण भी किया गया .दीदी ने उसका नाम ‘जॉन्टी’ रखा क्योंकि मेरे द्वारा रखे गए नाम वाले श्वान धोखेबाज़ निकले थे . वास्तव में इस बार हमने श्वान को नहीं रखा था बल्कि श्वान ने खुद ये निर्णय लिया था कि उसे किस घर में रहना है . एक दिन हम बिजली की दुकान से कुछ सामान लेने गए और ‘जॉन्टी भीड़ के कारण भ्रमित हो गया .मैंने सब ओर नज़र दौड़ाई पर वो दिखाई न दिया .मुझे चिंता हुई कि कहीं वो खो न जाये तभी मैने देखा वो दो लड़कियों के पीछे पीछे जा रहा था .कितने भोले होते हैं ये जीव उसे लगा होगा कि वे लड़किया हम हैं ! घर आकर देखा तो वो बाहर चबूतरे पर इत्मीनान के साथ बैठा हुआ था तब जाकर जान में जान आई .
हम मंदिर जाते तो रस्ते भर आगे आगे दौड़ता हुआ – भौकता हुआ जाता उस वक्त उसकी चाल में एक विशेष ही उछाल होता .लगता सड़क पर आने -जाने वालों से कह रहा हो ”जाने वालों जरा होशियार यहाँ के हम हैं राजकुमार ” पर जॉन्टी के इस उत्साहित उद्घोष से आने-जाने वाले डर जाते इसी कारण ये निश्चय किया गया कि उसे घर में ही रखा जाये .
घर के भीतर उसका अनुशासित व्यवहार सबकी सराहना पाता .उसके आस-पास चाहे कुछ भी रखा हो वो उसे नहीं छेड़ता .कई बार हम सोचते इसे इतना अनुशासित इसके पूर्व पालनकर्ता ने ही बनाया होगा .जॉन्टी कभी खड़े होकर नहीं खाता था वो एक विशेष मुद्रा में बैठकर ही खाता था .हमें उसके पूर्व मालिक पर बहुत दया आती कि ऐसे प्यारे श्वान को खोकर उसे कितना दुःख हुआ होगा ? इस विषय में धारणा मजाक में बनाई और जॉन्टी को प्यार से पकड़कर कई बार उससे पूछते -” बता खजाने की चाबी कहाँ है जो तू अपने पहले मालिक ज़हर सिंह की लेकर भागा है ?” जॉन्टी को तो कोई जवाब देना ही नहीं होता था क्योंकि हमारी भाषा के शब्द उसके लिए ”XXX YYY ZZZ ” ही होते थे .कई बार जब वह घर के कच्चे हिस्से को खोदता होता तब हम ये कहकर हँसते कि ”देखो जॉन्टी खजाने की चाबी ढूढ़ रहा है .”
जॉन्टी गर्मियों में बेहाल हो जाता और कुछ इस तरह शुरू होता उसका धरना-

मार्च आते ही उसकी गर्मियां जोर से शुरू हो  जाती थी  .चाहता था कमरे में  घुसकर पलंग के नीचे सोना ……आग्रह करता -जब  उसकी जिद नहीं मानी जाती तो ये भागकर जाकर कड़ी धूप में खड़ा हो जाता ….कौन समझा सकता था उसे ?
जॉन्टी ने हजारों बार बंदरों को भगाकर हमारी जान बचाई .बन्दर जॉन्टी शब्द सुनकर ही भागने लगते थे पर कई बार बंदरों ने संगठित होकर जॉन्टी को जब चारों ओर से घेर लिया तब हमें भी उसकी जान बचानी पड़ी .
जॉन्टी इतना प्यारा था कि मन करता उसे हर समय गोद में उठाये रखूँ .वो जब भी खुद को चाट-चाट कर चमका रहा होता तब हम कहते -”आज इसे ब्यूटी कॉन्टेस्ट में जाना है शायद .”
जॉन्टी कई बार तिकड़म भिड़ा कर घर से बाहर निकल जाता था तब बार -बार बुलाने पर जब वो अंदर न आता तब दीदी कहती -” देखो पेंट उतर गया !”अर्थात सड़क पर आवारागर्दी करने में जॉन्टी को जो आनंद आता वो घर में कहाँ !पर जब घूम-फिर कर मन भर जाता तब बाहर से भौंककर ऐसे आवाज लगाता जैसे हमने उसे घर से निकाल रखा हो .एक बार बढ़ई का काम करने वाले एक महोदय के सामने हमारे मुंह से निकल गया कि -”जॉन्टी तो आवाज़ लगाकर गेट खुलवाता है .” तब उसने जो प्रश्न किया उसे याद कर आज भी हम हॅसते-हॅसते पेट पकड़ लेते हैं .उसने पूछा -”ये आवाज़ कैसे लगाता है ?
जॉन्टी में गजब का धैर्य था .यदि वो भूखा है और हमें उसे खाना देने में देर लग रही है तो वो थोड़ी देर आग्रह कर चुपचाप बैठ जाता और जब हमें किचन की ओर जाते देखता तब फिर से आग्रह करता .उसका आग्रह का अंदाज़ भी निराला था .आप हाथ उसके आगे करके पूछिए ”खाना चाहिए ?”वो अपना अगला पंजा हाथ पर रख देता पर तुरंत हटा लेता कि कहीं हम पंजा न पकड़ लें .
जॉन्टी को मैं ”पूंछ वाला छोरा” कहकर भी लाड करती थी .उसके इसी नाम को लक्ष्य कर मैंने एक गीत ही रच दिया था जो उसके जितना सुन्दर तो नहीं पर उसकी तरह प्यारा जरूर है -

पूंछ   वाला   छोरा

ऊपर से नीचे से जब भी बुलाया
पूंछ वाला छोरा देखो दौड़ा दौड़ा आया .
………………………………..

पूंछ वाले छोरे की आँखे कजरारी
पूंछ वाला छोरा चलता चाल बड़ी प्यारी
पूंछ वाला छोरा देखो सबके मन को भाया
पूंछ वाला छोरा देखो दौड़ा दौड़ा आया .
…………………………………

पूंछ वाले छोरे की बातें  निराली
पूंछ वाला छोरा करता घर की रखवाली
पूंछ वाले छोरे ने बन्दर भगाया
पूंछ वाला छोरा देखो दौड़ा दौड़ा आया .

ऐसा नहीं है कि जॉन्टी का केवल लाड़ ही किया जाता हो .कई बार उसकी शैतानी पर उसे धमकाया भी गया .हमारी अनुपस्थिति में एक दिन वो मिठाई का डिब्बा लेकर अपने अनुसार घर के सुरक्षित स्थान पर ले गया और एक दिन दीदी का गरम टोपा दबाकर ऐसे मासूम बनकर बैठ गया जैसे उसे कुछ मालूम ही न हो जब हमें टोपा कहीं नहीं मिला तब उसे बहाना कर उसकी जगह से उठाया तो टोपा मिल पाया .















परिवार का ये प्यारा सदस्य पिछली अगस्त की २६ तारीख को हमेशा के लिए हमें छोड़कर चला गया .ईश्वर से यही प्रार्थना है कि इस पवित्र आत्माको फिर कभी इस श्वान योनि में न भेजें !
ॐ शांति !ॐ शांति !ॐ शांति !

शिखा कौशिक ‘नूतन’



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ranjanagupta के द्वारा
January 16, 2014

आपको भी अपनी तरह पशु प्रेम में व्यथित देख कर मन भर आया !बहुत आभार ! !

January 15, 2014

बहुत भावात्मक संस्मरण लिखा है आपने .आभार

Santlal Karun के द्वारा
January 14, 2014

आदरणीया शिखा जी, आप का यह संस्मरण बहुत अच्छा लगा | महादेवी जी की ‘गौरा’ और ‘गिल्लू’ की याद आ गई | हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

yatindranathchaturvedi के द्वारा
January 13, 2014

अद्भुत, बधाई, सादर


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