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''मेरी कविता को नहीं बंधन कोई स्वीकार'' [contest]

Posted On: 11 Jan, 2014 Contest में

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मेरी कविता को नहीं बंधन कोई स्वीकार ,
न छंद के नुपूर न रीति न अलंकार !
………………………………….
दोहे की चुनरी ओढ़ कहा छोड़ ढ़िठाई ,
चल मंद मंद नायिका सी बन के चौपाई ,
अंगड़ाई ले वो बोली मेरा उन्मुक्तता आधार !
मेरी कविता को नहीं बंधन कोई स्वीकार !
………………………………….
अनुप्रास की मेहँदी रचा नयनों में यमक काजल ,
कंगन पहन श्लेष के हे मूढ़मति ! पागल ,
बोली मुझे तो रुचता भावों का पुष्प-हार !
मेरी कविता को नहीं बंधन कोई स्वीकार!
………………………………………………..
कविता ने कहा मेरा अभिव्यक्ति ही निखार ,
उर में उठे हर भाव को देते रहो आकर ,
नित नवल भावमयी रचना मेरा श्रृंगार !
मेरी कविता को नहीं बंधन कोई स्वीकार !

शिखा कौशिक ‘नूतन’



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
January 12, 2014

बहुत ही सुन्दर! बस इतना ही … बाकी आदरणीय संतलाल करुण जी ने सबकुछ कह दिया है!

ranjanagupta के द्वारा
January 12, 2014

सुन्दर भाव व्यंजना!गीतात्मकता से मुक्ति !भाव ही प्राण है कविता के ,यही सही है !!बधाई !!

abhishek shukla के द्वारा
January 11, 2014

सहमत हुँ आपसे, कविता को छंदो में बंध कर सीमित हो जाती है इसे मुक्त रहना चाहिए…सुन्दर रचना आभार..

Santlal Karun के द्वारा
January 11, 2014

आदरणीया शिखा जी , आप ने ‘रस’, ‘अलंकार’, रीति’, ‘कक्रोक्ति’ आदि सिद्धांतों को नकारती, किन्तु ‘अभिव्यक्ति ही निखार’ के रूप में ‘अभिव्यंजनावाद’ को पुष्ट करती अति सुन्दर कविता रची है, हार्दिक आभार !


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