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प्रथम पुरुष स्त्रीवादी :आदिकवि वाल्मीकि [कांटेस्ट]

Posted On: 7 Jan, 2014 Contest में

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प्रथम पुरुष स्त्रीवादी :आदिकवि वाल्मीकि

भूतल के प्रथम काव्य ”रामायण ” के रचनाकार श्री वाल्मीकि ने अपने इस वेदतुल्य आदिकाव्य ”रामायण” द्वारा न केवल मर्यादा मूर्ति  श्री राम के चरित्र की रचना की बल्कि तत्कालीन समाज में स्त्री -जीवन की समस्याओं का यथार्थ चित्रण भी किया है .न केवल एक रचनाकार के रूप में वरन स्वयं ”रामायण” के ”उत्तरकाण्ड ” के ”षणवतित्म: [९६ ] ”सर्ग में सीता की शुद्धता का समर्थन करते हुए-उन्होंने यह सिद्ध किया है कि वह सम्पूर्ण विश्व के इतिहास में प्रथम पुरुष स्त्रीवादी थे .पश्चिम से नारीवाद की उत्पत्ति बतलाने वाले विद्वान भी यदि ”रामायण ”में महर्षि वाल्मीकि द्वारा चित्रित स्त्री जाति की समस्याओं ,स्त्री संघर्ष ,स्त्री -चेतना का अध्ययन करें तो निश्चित रूप से वे भी यह मानने के लिए बाध्य होंगे कि जितना प्राचीन विश्व का इतिहास है उतना ही प्राचीन है -स्त्री जाति के संघर्ष का इतिहास -वह स्त्री चाहे देव योनि की हो अथवा राक्षस जाति की .

”स्त्री जाति की हीन दशा ”वर्तमान में जितना बड़ा बहस का मुद्दा बन चुका है ,उसे उठाने का श्रेय महर्षि वाल्मीकि को ही जाता है .राजा दशरथ के पुत्र -प्राप्ति हेतु लालायित होने को महर्षि इस श्लोक के द्वारा उकेरते हैं -

”तस्य चैवंप्रभावस्य …………”[बालकाण्डे ;अष्टम:सर्ग:;

श्लोक-१]  अर्थात सम्पूर्ण धर्मो को जानने वाले महात्मा दशरथ ऐसे प्रभावशाली होते हुए भी पुत्रों के लिए सदा चिंतित रहते थे .उनके वंश को चलाने वाला कोई पुत्र नहीं था .]”


स्त्री की हीन दशा का मुख्य कारक जहाँ यह था कि पुत्री को वंश चलाने वाला नहीं माना जाता था वही पुरुष-प्रधान समाज में कन्या का पिता होना भी अपमानजनक माना जाने लगा था .महर्षि वाल्मीकि भगवती सीता के मुख से इसी तथ्य को उद्घाटित करते हुए लिखते हैं-

‘सदृशाच्चापकृष्ताच्च ……..”[अयोध्याकांडे अष्टादशाधिकशततम:

सर्ग: ,श्लोक -३५ ][अर्थात संसार में कन्या के पिता को ,वह भूतल पर इंद्र के तुल्य क्यों न हो ,वर पक्ष के लोंगों से ,वे समान या अपने से छोटी हैसियत के ही क्यों न हों ,प्राय: अपमान उठाना पड़ता है ]

इसी प्रकार के उद्गार महर्षि वाल्मीकि ने उत्तर-कांड  के ”त्रयोदश : सर्ग ” के श्लोक ११ व् १२ में मंदोदरी के पिता राक्षसराज मय के मुख से भी प्रकट करवाएं हैं -

”कन्या पित्र्त्वं……स्थाप्य तिष्ठति ”

[अर्थात -मान की अभिलाषा रखने वाले प्राय: सभी लोगों के लिए कन्या का पिता होना कष्टकारक होता है .कन्या सदा do  कुलो को संशय में डाले रहती है ]

महर्षि वाल्मीकि ने स्त्री के विरुद्ध किये जाने वाले अपराधों को भी स्थान-स्थान पर उद्धृत किया है .आज भी जहाँ ‘बलात्कार ”जैसे अमानवीय अपराध को स्त्री की पवित्र -अपवित्रता के साथ jodkar बलात्कृत स्त्री को नारकीय परिस्थितियों में धकेल दिया जाता है उसी व्यथा को महर्षि ने रामायण काल में घटित ”अहल्या -उद्धार-प्रसंग’के माध्यम से उद्घाटित करने का सशक्त प्रयास किया है .”उत्तरकाण्ड ‘के ‘त्रिंश सर्ग:’ के ३९वे व् ४० वे श्लोक में अहल्या अपना पक्ष रखते हुए कहती हैं -

”सा तम प्रसाद्यामास ….कर्तुम्हरसी ”

[अर्थात -विप्रवर !बहम्र्षे! देवराज इंद्र ने आपका ही रूप धारण कर मुझे कलंकित किया है .मैं उसे पहचान न सकी थी .अत: अनजाने में मुझसे यह अपराध हुआ ,स्वेच्छाचारवश  नहीं .इसलिए आपको मुझपर कृपा करनी चाहिए ]

किन्तु अहल्या के पतिदेव गौतम ऋषि उन्हें क्षमा नहीं करते .हजारों वर्षों की तपस्या  के पश्चात् श्री राम द्वारा चरण छूकर उन्हें सम्मानित किये जाने पर अहल्या पुन: पति सामीप्य को प्राप्त करती हैं .

पुरुष-अहम् किस प्रकार स्त्री-जाति के सम्मान को रौंदता आया है -इसका उल्लेख महर्षि वाल्मीकि ने रावन द्वारा रम्भा से बलात्कार,वेदवती के साथ दुर्व्यवहार ,देवताओं की कन्याओं व् स्त्रियों का अपहरण आदि प्रसंगों द्वारा किया है .रावन के इसी प्रकार के पापों का दंड देने के लिए श्री राम व् माता सीता के मनुष्य रूप में अवतार लेने का वर्णन महर्षि ने किया है .

महर्षि वाल्मीकि स्त्री -जाति को सम्मान दिए जाने की वकालत करते हुए अपने आदर्श मर्यादा-पुरषोंतम श्री राम तक को कटघरे में खड़ा कर देते हैं -जब श्री राम भगवती सीता से अयोध्या के  जन समुदाय के समक्ष अपनी शुद्धता प्रमाणित करने के लिए कहते हैं .महर्षि यद्यपि भविष्य दृष्टा  थे किन्तु उन्होंने अपने वचनों द्वारा श्री राम व् अयोध्या के जन समुदाय को संतुष्ट करने का प्रयास भी किया .उन्होंने कहा-

”लोकाप्वादभितास्य ………. तम्नुग्याअह्रसी   ”

[उत्तरकाण्ड षणवतितम: सर्ग: श्लोक -१७ ]

[अर्थात महान व्रतधारी श्री राम !लोकापवाद से डरे हुए आपको सीता अपनी शुद्धता का विश्वास दिलाएगी .इसके लिए आज्ञा दें ]


”इमौ तू …..ब्रवीमि ”[श्लोक-१८]


[अर्थात-ये दोनों कुमार कुश और लव जानकी के गर्भ से जुड़वे पैदा हुए हैं .ये दोनों आपके ही पुत्र हैं और आपके ही सामान दुर्धर्ष वीर हैं ,यह मैं आपको सच्ची बात बता रहा हूँ ]


”प्रचेतसोहहम……पुत्रकौ ”[श्लोक-१९]

”बहुवर्ष ……..मैथिली ‘ [श्लोक २० ]


[अर्थात-रघुकुलनंदन !मैं प्रचेता [वरुण ]का दसवां पुत्र हूँ .मेरे मुह से कभी झूठ बात nikli हो .इसका  मुझे स्मरण  नहीं .मैं सत्य कहता हूँ ये दोनों आपके ही पुत्र हैं [१९].मैंने कई हज़ार वर्षों तक भारी तपस्या की है यदि मिथिलेशकुमारी सीता में कोई भी दोष हो तो मुझे उस तपस्या का फल न मिले (२०) ]

स्पष्ट है कि मानव इतिहास में ऐसा पुरुष ढूढने पर भी नहीं मिलेगा जो पति द्वारा त्यागी गयी,जनसमुदाय   द्वारा लांछित की गयी स्त्री को और उसके  गर्भ में पल  रहे बालकों को न केवल आश्रय देकर सम्पूर्ण समाज से लोहा ले और भरी सभा में अपने द्वारा संचित हजारों वर्षों के पुण्यों को दांव पर ”केवल एक स्त्री की  अस्मिता को पुनर्स्थापित” करने हेतु लगा दे .महर्षि वाल्मीकि इसी कारण स्त्री -जाति के मूक  मुख में स्वर भरने वाले ;माता के सम्मान हेतु ”लव-कुश ” जैसी संघर्षशील संतानों   के गुरु-समस्त  मानव जाति के इतिहास में प्रथम पुरुष स्त्रीवादी थे -यह मानने में किसी  प्रकार की शंका व्यक्त नहीं की जानी चाहिए .


[शोध ग्रन्थ  -श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण :गीताप्रेस गोरखपुर संवत -२०६३]

शिखा कौशिक

http://vicharonkachabootra.blogspot.com/



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
January 11, 2014

दुर्लभ और गम्भीर विषयवस्तु पर सुन्दर गवेषणा ! शिखा जी ! बधाई !!

January 11, 2014

बहुत सुन्दर और ज्ञानप्रद लेख मैडम जी

jlsingh के द्वारा
January 10, 2014

आपके इस विशेष आलेख पर टिप्पणी करना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा होगा. वास्तव में महर्षि बाल्मीकि ने उस समय की सामाजिक स्थिति के अनुसार नारी को सम्मान का अधिकारी बताया था और सीता को पुत्री जैसा आश्रय भी तो दिया था. लव कुश को इस योग्य बनाया कि वह श्रीराम से सवाल कर सके….. महान ग्रन्थ के रचयिता महर्षि बाल्मीकि और उनकी श्रेष्ठ कृति इसीलिये आज भी समीचीन है प्रासंगिक है….


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