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साकेत कहाँ साकेत रहा जिसमे स्नेही तात नहीं !

Posted On: 24 Dec, 2013 Junction Forum,Celebrity Writer,Hindi Sahitya में

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हे अनुज मेरे ! मेरे लक्ष्मण ! एक व्यथा ह्रदय को साल रही ,
साकेत कहाँ साकेत रहा जिसमे स्नेही तात नहीं !
……………………………………………………….
जब चला था वचन निभाने मैं कितने थे व्यथित पितु मेरे !
एक पल सोचा था रुक जाऊँ पर धर्म का संकट था घेरे !
रघुकुल की रीत निभाना ही उस वक्त लगा था मुझे सही !
साकेत कहाँ साकेत रहा जिसमे स्नेही तात नहीं !
………………………………………………………..
माँ ने बतलाया था मुझको पितु करते कितना स्नेह हमें !
ले गोद हमें हर्षित होते जब हम सब थे नन्हे-मुन्ने !
अब तात के दर्शन न होंगे उर फट जाता है सोच यही !
साकेत कहाँ साकेत रहा जिसमे स्नेही तात नहीं !
……………………………………………………
स्मरण तुम्हें होगा लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र पधारे थे !
जाने को दे दी थी आज्ञा पर चिंतित तात हमारे थे !
संकट से घिरे देख हमको नयनों से अश्रुधार बही !
साकेत कहाँ साकेत रहा जिसमे स्नेही तात नहीं !
……………………………………………………..
कर्तव्य ज्येष्ठ संतान का है दे अग्नि पितृ-चिता को वो !
पर राम अभागा कितना है पितृ-ऋण से उऋण न जो !
हूक सी उठती है उर में जाती न मुझसे हाय सही !!
साकेत कहाँ साकेत रहा जिसमे स्नेही तात नहीं !

शिखा कौशिक ‘नूतन’



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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sanjay kumar garg के द्वारा
December 29, 2013

शिखा जी, सादर नमन! सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई!

yamunapathak के द्वारा
December 28, 2013

अत्युत्तम रचना शालिनी jee

    yamunapathak के द्वारा
    December 28, 2013

    शिखा जी जल्दी में आपका नाम शालिनी लिख गया आअपकी यह रचना बहुत ही अच्छी लगी

ashishgonda के द्वारा
December 27, 2013

आदरणीया शिखा जी! बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना, सीधे ह्रदय तक पहुँच गई और पिता का महत्व समझ आया…माता-पिता से बढ़कर कोई भगवान् नहीं….

abhishek shukla के द्वारा
December 27, 2013

आपकी कविता पढ़ कर मैथिलीशरण गुप्त जी के महाकाव्य ‘साकेत’ कि कुछ पंक्तियाँ याद आ गयीं…..अद्भुत….आभार, पंक्तियाँ निम्नवत हैं- पटके मैंने पद-पाणि मोह के नद में, जन क्या क्या करते नहीं स्वप्न में, मद में? हा! दण्ड कौन, क्या उसे डरूँगी अब भी? मेरा विचार कुछ दयापूर्ण हो तब भी। हा दया! हन्त वह घृणा! अहह वह करुणा! वैतरणी-सी हैं आज जान्हवी-वरुणा!! सह सकती हूँ चिरनरक, सुनें सुविचारी, पर मुझे स्वर्ग की दया दण्ड से भारी। लेकर अपना यह कुलिश-कठोर कलेजा, मैंने इसके ही लिए तुम्हें वन भेजा। घर चलो इसी के लिए, न रूठो अब यों, कुछ और कहूँ तो उसे सुनेंगे सब क्यों?

harirawat के द्वारा
December 25, 2013

शिखा जी बहुत सुन्दर कविता के लिए धन्यवाद ! आपने मेरे ब्लॉग में आकर अपनी प्रतिक्रया दी आभारी हूँ ! हरेन्द्र जागते रहो

December 25, 2013

बहुत सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति .आभार शिखा जी


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