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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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अँधेरी ,संकरी ,घुटनभरी है वो अंतहीन गली !!

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माँ ने कसकर पकड़ी
बिटिया की हथेली ,
खींचते हुए उसे
अपने साथ ले चली ,
अँधेरी ,संकरी ,घुटनभरी
थी वो अंतहीन गली !!
**************************
न दिखता था कुछ ,
न ही कुछ सूझता था ,
हैवानी साये नोंचना चाहते थे
माँ और बेटी दोनों को
खुद को बचाती माँ ,
बेटी को छिपाती ,
थर -थर कांपती ,
बेटी को छाती से चिपटाती,
माँ बढती आगे-आगे
पर किधर -कहाँ ?
ये थी कुटिल पहेली !
क्योंकि अँधेरी ,संकरी ,घुटनभरी
थी वो अंतहीन गली !!
**************************
चलते चलते थकने लगी माँ ,
होने लगी निढाल ,
बेटी ने दिया सहारा ,
तभी बेटी को उसकी बेटी ने पुकारा ,
माँ को वहीँ छोड़ बेटी ने दौड़कर
अपनी बिटिया की कसकर
पकड़ी हथेली पर
फिर नहीं पकड़ में आया बेटी को
उसकी माँ का हाथ ,
माँ को निगल गयी
अँधेरी ,संकरी ,घुटनभरी
थी वो अंतहीन गली !!
***********************
ये गली है पुरुष अहम् की
जिसमे से होकर गुजरना है
हर माँ और उसकी बेटी को ,
इसमें तानाशाही के हैं अँधेरे ,
स्त्री को दोयम दर्जे का प्राणी
बनाये रखने का संकरापन
और स्त्री देह के शोषण की घुटन ,
अंतहीन हैं अत्याचार पुरुष के ,
नहीं पहुंची एक भी किरण समानता की
और न ही चली स्त्री के अस्तित्व
को स्वीकारती गुलाबी हवा
क्योंकि ये गली है
अँधेरी ,संकरी और घुटनभरी !!

शिखा कौशिक ‘नूतन’



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

September 28, 2013

स्त्री को दोयम दर्जे का प्राणी बनाये रखने का संकरापन और स्त्री देह के शोषण की घुटन , अंतहीन हैं अत्याचार पुरुष के , SAHI KAH RAHI HAIN AAP .

Jaya Tiwari के द्वारा
September 25, 2013

डॉ शिखा जी, मार्मिक पंक्तियाँ बहुत कुछ कह गई ये पंक्तियाँ आभार

Santlal Karun के द्वारा
September 25, 2013

नारी के अपमान और अंतहीन यातना की अकथ संवेदनाओं को व्यक्त करती पठनीय कविता; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! “ये गली है पुरुष अहम् की जिसमे से होकर गुजरना है हर माँ और उसकी बेटी को , इसमें तानाशाही के हैं अँधेरे ,”


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