! अब लिखो बिना डरे !

शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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सिले लबों के टाँके सब टूटने लगे

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सिले लबों के टाँके सब टूटने लगे

सिले लबों के टाँके सब टूटने लगे ,

मर्द के गुरूरी कोठे सब टूटने लगे !

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ज़ुल्म के जिन पिजरों में कैदी थे ख्वाब ,

जंग खाकर पिंजरे वे सब टूटने लगे !

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सहकर सितम खिलाई मैंने वफ़ा की रोटी ,

बर्दाश्त के अब चूल्हे सब टूटने लगे !

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कैदखाना था मेरा चौखट व् दीवारें ,

बढ़ते मेरे वजूद से सब टूटने लगे !

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’नूतन’ यकीन कर बदली मेरी सूरत ,

मर्दाना डर के आईने सब टूटने लगे !

शिखा कौशिक ‘नूतन’



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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santlal Karun के द्वारा
September 22, 2013

आदरणीया शिखा जी, मार्मिक, प्रासंगिक हिन्दी ग़ज़ल, सार्थक, संवेदनात्मक; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

September 21, 2013

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति नूतन जी .

सद्गुरुजी के द्वारा
September 21, 2013

नूतन’ यकीन कर बदली मेरी सूरत , मर्दाना डर के आईने सब टूटने लगे ! आप की कविता अच्छी लगी.बधाई.


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