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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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contestहिंदी दिवस पर ‘पखवारा’ के आयोजन का कोई औचित्य है या बस यूं ही चलता रहेगा यह सिलसिला?-हाँ !

Posted On: 9 Sep, 2013 Contest में

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हॉकी -’हिंदी” पीती अपमान का गरल !
अपनी ही मातृ-भाषा के प्रति भारतवासियों का जो व्यवहार है वो अत्यंत निंदनीय है .राष्ट्रिय खेल हॉकी के माध्यम से इस दर्द को ”हिंदी ” कैसे प्रकट करती है ?इसकी एक झलक देखिये -

एक दिन हॉकी मिली ;

क्षुब्ध थी ,उसे रोष था,

नयन थे अश्रु भरे

मन में बड़ा आक्रोश था .

अपमान की व्यथा-कथा

संक्षेप में उसने कही ;

धिक्कार !भारतवासियों पर

उसने कही सब अनकही .

पहले तो मुझको बनाया

देश का सिरमौर खेल ;

फिर दिया गुमनामियों के

गर्त में मुझको धकेल .

सोने से झोली भरी

वो मेरा ही दौर था ,

ध्यानचंद से जादूगर थे

मेरा रुतबा और था .

कहकर रुकी तो कंधे पर

मैं हाथ रख बोली

सुनो अब बात मेरी

हो न यूँ दुखी भोली .

अरे क्यों रो रही है अपनी दुर्दशा पर ?

कर इसे सहन

मेरी तरह ही पीती रह

अपमान का गरल

मैं ”हिंदी” हूँ बहन !

मैं” हिंदी ” हूँ बहन !!

शिखा कौशिक ‘नूतन’



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

udayraj के द्वारा
September 16, 2013

एक नये रूप में हॉकी और हिंदी की दुर्दशा का व्यांन । एक सार्थक प्रस्तुदति । हिंदी और हॉकी के दर्द का कारण है — ‘गैरों पे करम अपनो पे सितम’

September 10, 2013

कर इसे सहन मेरी तरह ही पीती रह अपमान का गरल मैं ”हिंदी” हूँ बहन ! मैं” हिंदी ” हूँ बहन !! सही उकेरा है हिंदी के दर्द को .


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