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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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हर तरफ आवाज ये उठने लगी

Posted On: 5 Sep, 2013 Others में

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”सौप कर जिनपर हिफाजत मुल्क की ;
ले रहे थे साँस राहत की सभी ;
चलते थे जिनके कहे नक़्शे कदम पर ;
जिनका कहा हर लफ्ज तारीख था कभी ;
वो सियासत ही हमे ठगने लगी है ;
हर तरफ आवाज ये उठने लगी है .
********************************************
है नहीं अब शौक खिदमत क़ा किसी को ;
हर कोई खिदमात क़ा आदी हुआ है ;
लूटकर आवाम क़ा चैन- ओ -अमन ;
वो बन गए आज जिन्दा बददुआ हैं ;
वो ही कातिल ,वो ही हमदर्द ,ये कैसी दिल्लगी है ;
हर तरफ आवाज ये उठने लगी .
**********************************************
कभी जो नजर उठते ही झुका देते थे;
हर एक बहन के लिए खून बहा देते थे ;
कोई फब्ती भी अगर कसता था ;
जहन्नुम उसको दिखा देते थे ;
खुले बाजार पर अब अस्मतें लुटने लगी हैं ;
हर तरफ आवाज ये उठने लगी है .

शिखा कौशिक ‘नूतन ‘



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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jaishree Verma के द्वारा
September 9, 2013

वो ही कातिल , वो ही हमदर्द , बहुत खूब शिखा जी !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
September 8, 2013

कभी जो नजर उठते ही झुका देते थे; हर एक बहन के लिए खून बहा देते थे ; कोई फब्ती भी अगर कसता था ; जहन्नुम उसको दिखा देते थे ; खुले बाजार पर अब अस्मतें लुटने लगी हैं ; हर तरफ आवाज ये उठने लगी है . डॉ शिखा जी बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ..सामयिक झलक और दर्द झलका ….काश कुछ बदले

bhanuprakashsharma के द्वारा
September 8, 2013

सुंदर अभिव्यक्ति, बधाई।

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
September 8, 2013

मन की द्रडता फौलादी ईरादे भय मुक्रत करते है,,,,,, डा, शिखा आगे बडो सफलता तुम्हारा रास्ता खुद बनाती जायेगी,,    साथ मै,,,,,,, ओम,,,, शांति ,,,,शांति शांति का जाप करते मनोबल बडाती रहो ,,,,

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
September 8, 2013

आज की त्रासदी को वयां करती सुन्दर प्रस्तुति ! बधाई !

jlsingh के द्वारा
September 8, 2013

बेहद खौफनाक मंजर अब यहाँ दिखने लगी है … चिंतनीय!

udayraj के द्वारा
September 7, 2013

वो ही कातिल ,वो ही हमदर्द ,ये कैसी दिल्लगी है ; हर तरफ आवाज ये उठने लगी . …………..बहु‍त सुंदर प्रस्तुति ।

Bhagwan Babu के द्वारा
September 7, 2013

बहुत ही सुन्दर रचना… बधाई के पात्र है आप…

Santlal Karun के द्वारा
September 6, 2013

आदरणीया शिखा जी, वर्तमान भ्रष्ट जीवन के विडंबन पर उत्कृष्ट व्यंग्यात्मक कविता, अत्यंत प्रभावपूर्ण; साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

September 5, 2013

है नहीं अब शौक खिदमत क़ा किसी को ; हर कोई खिदमात क़ा आदी हुआ है ; लूटकर आवाम क़ा चैन- ओ -अमन ; वो बन गए आज जिन्दा बददुआ हैं ; बहुत प्रेरक व् भावपूर्ण पंक्तियाँ .


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