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शीशे के हम नहीं कि टूट जायेंगे ; फौलाद भी पूछेगा इतना सख्त कौन है .

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ऐसे समाज को फांसी पर लटका दो -लघु कथा

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Seagull collects a puffin

अस्पताल के बाहर मीडियाकर्मियों व् जनता की भीड़ लगी थी .अन्दर इमरजेंसी में गैंगरेप  की शिकार युवती जिंदगी व् मौत से जूझ रही थी .मीडियाकर्मी आपस में बातचीत कर रहे थे -”अरे भाई लड़की का नाम व् पता बदलकर छापना ….बेचारी अगर जिंदा बच गयी तो इस समाज का सामना कैसे करेगी ?”जनता का मुख्य उद्देश्य भी युवती का नाम -पता जानना था .तभी अस्पताल के भीतर से एक प्रौढ़ महिला हाथ में एक फोटो लिए बाहर आई . और अस्पताल  के सामने एकत्रित भीड़ को मजबूत स्वर में संबोधित करते हुए बोली -”मैं उस पीडिता की माँ हूँ [ ये कहकर फोटो लिए हाथ को ऊपर उठा दिया ] ये मेरी बेटी अस्किनी का फोटो है जो भीतर जिंदगी व् मौत से जूझ रही है .हम इसी शहर के स्थानीय निवासी हैं और हमारा घर करोड़ी मौहल्ले में है .हमारा मकान नंबर २/४१ है .अस्किनी के पिता जी अध्यापक हैं और छोटा भाई पीयूष दसवी कक्षा का छात्र है .

…..आप सोच रहे होंगें कि मैं ये सब जानकारियां स्वयं आप को क्यों दे रही हूँ .मैं ये सब इसलिए बता रही हूँ कि मेरी बेटी ने कोई अपराध नहीं किया है जो उसका नाम व् पता छिपाया जाये .यदि वो जिंदा बच गयी तो हमारे परिवार में उसका वही लाड   होगा जो इस हादसे से पहले होता था .मुंह तो उन कुकर्मी कुत्तों का छिपाया जाना चाहिए जिन्होंने मेरी बेटी के साथ दुष्कर्म किया है .नाम व् पता वे छिपाते फिरे और उनके परिवार वाले .मेरी बेटी के साथ यदि यह समाज इस हादसे के बाद कोई गलत व्यवहार करता है तो निश्चित रूप से उन दुराचारी कुत्तों के साथ इस समाज को भी खुलेआम फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए .” ये कहकर वे मुड़ी और तेज़ क़दमों से अस्पताल के भीतर पुन:  चली गयी

शिखा कौशिक ”नूतन”

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7 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ajaykr के द्वारा
December 22, 2012

किसी महिला के साथ विकृत मानसिकता के बीमार लोग जब जबरदस्ती करते हैं ,तो उस महिला के लिए हमारा समाज इतना कड़ा रवैया क्यों अपना लेता हैं , छोटी मोटी शारीरिक क्षति हमारा शरीर खुद सही कर लेता हैं , क्यों लगातार उसका मानसिक बलात्कार करता रहता हैं ,क्यों उसको एहसास दिलाता रहता हैं कि तू विक्टिम हैं और अब कोई भला लड़का/परिवार तुझे नही मिलेंगा आदि आदि …..क्या यौन अंगों की शुचिता का प्रश्न सिर्फ महिलाओ के लिए हैं ?जिन्हें इस देश में आदि काल से देवी के रूप में पूजा जाता रहा हैं |सड़को पर,चलती बसों में हर जगह महफूज क्यूँ नही हैं औरते ? “माँ,बहन,बेटी या महबूब के साये से जुदा, एक लम्हा न हो, उम्मीद करता रहता हूँ एक औरत है मेरी रूह में सदियों से दफ़न , हर सदा जिस कि,मैं बस गीत करता रहता हूँ …!”

seemakanwal के द्वारा
December 21, 2012

ऐसे लोगों को तुरंत फासी पर लटका देना चाहिए .

nishamittal के द्वारा
December 21, 2012

आपने सही कहा है,परन्तु यही तो दुर्भाग्य है कि पीडिता को हमारा समाज अपराधिनी बना देता है.


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