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मृत्यु तक फांसी पर लटकाया जाये गोपाल कांडा को !

Posted On: 19 Aug, 2012 Others में

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मृत्यु तक फांसी पर लटकाया जाये गोपाल कांडा को !

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[मरते दम तक गीतिका के साथ हुई दरिंदगी]
‘कांडा सिलेक्ट करता था लड़कियों की ड्रेस व शूज’

नन्ही सी चिड़िया और हैवान बाज़ !

नन्ही सी चिड़िया उड़ रही थी ;
नन्हे से दिल को थाम ,
पीछे से आया दुष्ट
बाज़ एक शैतान ,
बोला सिखाऊंगा तुझे
ऊँची मैं उडान ,
तुझको दिखाऊंगा
शोहरत के आसमान ,
उड़ने लगी भोली सी वो
उसको न था गुमान ,
ऊँचें पहुचकर नोंचने
लगा उसे हैवान ,
जख्म इतने दे दिए
वो हो गयी निढाल ;
गिर पड़ी ज़मीन पर
त्याग दिए प्राण ,
चिड़िया थी प्यारी ”गीतिका ”
और बाज़ है ”गोपाल ”
ऐसी मिले सजा इसे कि
काँप जाये काल !!!

गीतिका को वापस न ला पायेंगें !

नन्ही सी गीतिका के संवार कर बाल ;
माँ ने किया होगा लाडो से ये सवाल
क्या बनेगी नन्ही सी मेरी परी बड़ी होकर ?
फैलाकर नन्ही बांहें वो बोले होगी हंसकर
माँ मैं उड़नपरी बनकर आसमान में उडूँगी
ला तारे तोड़कर तेरी गोद में भरूँगी ,
चूमा होगा माँ ने माथा अपनी इस कली का
पर क्या पता था दोनों को होनी के खेल का ?
एक हैवान ”गोपाल” उनके जीवन में आएगा ,
सपने दिखाकर कली को हो नोंच जायेगा ,
उसने खरोंच डाला गीतिका का तन मन
और माँ से उसकी उडान परी को दूर ले गया
इतनी दूर कि चाहकर भी कोई
गीतिका को वापस नहीं ला सकता !!!

[ इस हैवान के लिए बस एक ही सजा है ''मौत की सजा '']

शिखा कौशिक
[विचारों का चबूतरा ]



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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pitamberthakwani के द्वारा
September 1, 2012

शिखा जी, आपका आक्रोश बिलकुल सही है आपने मेरी पोस्ट सपाटबयानी में नहीं देखी है उसे जरूर देखे ! आपने लिखा है की कांदा को मरने तक फांसी पर लटकाया जाए सही है, पर क्या आप नहीं जानती की फांसी तोहोती ही इसीलिए है!

dineshaastik के द्वारा
August 20, 2012

गोपाल काँडा के कुकृत्य पर निश्चित ही कड़ी हो, लेकिन हमें इसका दूसरा पक्ष भी सोचना  चाहिये। कन्या गीतिका के परिवार के लोग इसके लिये जिम्मेदार नहीं है। चलो मान लिया  कि गीतिका को ऊँच नीच की समझ नहीं थी। किन्तु गीतिका के माँ बाप तो परिपक्य थे। मेरा मानना है कि कांडा को तो सबसे सजा मिले, लेकिन अपनी बेटी के लिये अपने कर्तव्यों  का सही रूप से पालन न करने के अपराध में माँ बाप को भी कुछ न कुछ सजा मिले, चाहे वह केवल एक चेतावनी ही क्यों न हो।

rajivupadhyay के द्वारा
August 19, 2012

आदरणीय शिखा जी भावनाओं में बहने से न्याय व् सुधर संभव नहीं है.  यह सच है कि गीतिका शर्मा ने आत्महत्या कि जो क्षोभनिया है . इसे हम सबको विचलित करना स्वाभाविक है .  किन्तु जब उन्होंने फ्लैट , मेर्सदेसे कार व् अन्य महँगी वस्तुए गिफ्ट में ली तो क्या उनके परिवार वालों का कर्तव्य नहीं था कि अपनी बेटी को चेतावनी दें कि यह रह मृतु पर ही ले जाती है . दोनों परिवारों कि निरी विडियो फिल्म आ रहीं हैं . तो क्या ये नहीं मन जाय कि इस नाजायज़ रिश्ते को दोनों के परिवार वालों ने मंजूरी द्दी थी . जब बोये पेड़ बबूल के तो आम कहाँ से खाय . यह मौत ग्लानी से हो सकती है पर गोपाल कांदा कि कितनी जिम्मेवारी है और गीतिका कि माँ कि कितनी यह समाज को सोचना होगा . भावनाओं में बहने से जीवन कि वैतरणी पार नहीं हो सकती. राजीव उपाध्याय

August 19, 2012

कविता अच्छी है…भावना अच्छी है पर इन गीतिकाओं को भी अपना भला-बुरा पहचानना चाहिए…..क्या वाकई सारा दोष सिर्फ कांडा का ही रहा है????

kraant के द्वारा
August 19, 2012

बहुत अच्छी कविता और बेहद अच्छी भावनाएं !  गीतिका एक बहुत ही बहादुर नारी थी जिसने ये जान लिया था की उसके बलिदान देने से ही इस दुष्ट का आतंक रुकेगा. आज ऐसे आतंकी नेताओं के खिलाफ एकजुट होने की आवश्यकता है जाने ऐसी कितनी गीतिका ख़ामोशी से ज़ुल्म सहते हुए जिंदगी बिता देती हैं. आपको बधाई !


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